इश्क़ का ये  फ़ासला तो वक़्त का  दस्तूर   है ।
दर्द  भी  हिस्से  का  तेरे  ऐ  सनम!  मंजूर  है ।

देखता  हूँ  शक़्ल  तेरी  ले  चिरागा  रात  भर ।
है नही दिल को  ख़बर ये  आशिक़ी में  चूर है ।

बात  सुन  ख़ामोश  तेरी  ये  अदायें  हो  गयी ।
अश्क़  आंखों  में सजाकर आरजू मजबूर है ।  

आ सको तो देख लो ये  ग़म भरी  तनहाइयाँ ।
आज़कल जख़्मे निशाँ वह  हो गया नासूर है ।

रफ़्ता- रफ़्ता इश्क में गम करवटें लेने लगा ।
पर मज़ा दिल  को मेरे  मिल  रहा भरपूर  है ।

मंज़िलें  तो  पास में ठहरी  हुई  है  आजकल ।
रास्ता घर का तेरे  बस कदमभर  कुछ दूर हैं ।

टूट जाना है नही 'रकमिश'  कोई  दीवानगी ।
इल्म  है तो  इश्क़ का ग़म भी यहाँ काफ़ूर है ।  

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