||कुण्डलिया छंद ||

उलझे आँसू नैन में , करते विरह बखान !
प्रेम सघन है राम से , जाग उठा दिनमान !
जाग उठा दिनमान , गीत रस सरिता बहती!
प्राण बहे अविराम, जगत की तृष्णा ढहती !
पागलपन के दौर , अलख की गुत्थी सुलझे !
सद्गुरु सदा सहाय , सिंधु मे चेतन उलझे!!

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