"जब देखो तब इस आराम कुर्सी में बैठे रहते हो बाऊजी, जाओ ना कहीं घूम आओ…..रिटायर हो गये तो  जिंदगी तो खतम नहीं हुई ना….. और ऐसे बैठे रहोगे तो बदन अकड़ जायेगा आपका…..माँ तो पहले ही गुजर गईं भाई भी छोटा है मैं कब तक दूसरे शहर से आ आकर  आपको देखती रहूँगी जरा स्वयं का ध्यान रखा करो।" संजना को सब याद आ रहा था जो वो पिता को झूठ मुठ के गुस्से से उलाहने देती थी। आज पिता के बिना उसकी कुर्सी को देख भावविह्वल हुये जा रही थी। पिता का यूँ जाना उसे अंदर ही अंदर तोड़ रहा था। यूँ तो ससुराल इंदौर और पीहर देवास ,दोनों शहरों में ज्यादा फासला नहीं था। कुछ महीनों में चक्कर लगा लेती थी संजना। पिता पर उसकी जान जो बसती थी।
"अरे अब तेरी भी गृहस्थी है…. जरा उधर भी ध्यान लगा….कब तक मेरे लिये मन भटकाती रहेगी।" उसके पिता सुरेंद्र बाबू बोल पड़ते थे। " हाँ मेरा आना अब आपको खटकता रहता है ना …..ठीक है अबसे नहीं आऊँगी।" संजना तुनकते हुये बोल पड़ती और सुरेंद्र बाबू हँस पड़ते। इसी आराम कुर्सी में बैठे उनकी और संजना की नोक झोंक चलती रहती।
"देख मैं बूढ़ा हो रहा हूँ जीवन का क्या भरोसा अब मृत्यु कभी भी आ सकती है…मेरे लिये इतना लगाव मत रखा कर !" इस बार बड़ी संजीदगी से बोल रहे थे सुरेंद्र बाबू।
"बाऊजी आपको मेरा आना नहीं पसंद तो नहीं आऊँगी …पर ये मरने वरने की बात मत किया करो हाँ…. आप अभी बरसों तक यहीं रहोगे आपकी कुंडली में लिखा है …..देखना मैं आपकी गोद में बैठ कर अलविदा होऊँगी"। संजना जैसे भरोसे से कह रही थी।
"येssssक्याssss ऊटपटांग बातें किये जा रही है।''सुरेंद्र बाबू लगभग चीखते हुए बोले।
यही संजना और उसके बाऊजी की इस शरीर में आखिरी मुलाकात थी। ससुराल इंदौर  जाते ही कुछ दिनों में संजना की बहुत तबियत खराब रहने लगी चेकअप कराया तो कैंसर आखरी स्टेज पर था। सुरेंद्र बाबू को बेटी की ये लाइलाज बीमारी सदमा दे गई और वो चल बसे। संजना की हालत अधिक बिगड़ने के कारण उसे पिता के मौत की खबर नहीं दी गई। कुछ दिन बाद संजना बाऊजी के पास देवास जाने की जिद करने लगी।
डॉक्टर से सलाह लेकर ये तय हुआ कि अब समय का भरोसा नहीं इसलिये संजना का कहा मान देवास ले जाएं।
पीहर में संजना पिता की सूनी कुर्सी को देख सारी बातें याद कर रही थी भावविह्वल हो रही थी। अचानक वो उठी और पिता की कुर्सी पर ऐसे बैठी जैसे वो  बचपन में उनकी गोद में बैठती थी।आज भी उसे जैसे वही वात्सल्य महसूस हो रहा था उसका शांत ,सुकून से भरा हुआ चेहरा आँखे मूंदे हुए था।
"अरे दीदी चलो खाना खा लो"…भाई बुलाने आया तो देखा वो हमेशा के लिये सो गई थी अपने पिता के कुर्सी में मानो उनके गोद में ही सो रही है।

[zombify_post]

Comments

comments