जानूं मैं राज़ ज़ीस्त का तू  मत सफाई दे
देना अगर है कैद से मुझको रिहाई दे

वो कान दे मुझे खुदा ता उम्र के लिये
चारो तरफ तुम्हारी ही आहट  सुनाई दे

इक बार देख लू तुझे ये है दुआ मेरी
फिर उसके बाद कुछ भी न मुझको दिखाई दे

जीना है तेरे प्यार में इक उम्र जिंदगी
ये जान ही निकल पड़े मत वो जुदाई दे

देना है जो भी दे मुझे सब कुछ कबूल है
तकदीर में जरा भी न तू जग हँसाई दे

कुछ  ढूंढना है मुझको भी सूरज की धूप में
जुलमत की कैद से कभी मुझको रिहाई दे

तुझसे न माँगू औऱ तो जाऊँ कहाँ बता
तेरे सिवा न दूसरा मुझको सुझाई दे

हर दिल मे अपने प्यार की शम्आ जला सकूँ
रह जाएं देखते सभी ऐसी खुदाई दे

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