प्रिय कहें श्रृंगारिके तुम
इस तरह श्रृंगार करना
नेह का सिंदूर ले कर
तुम सुभग सीमन्त भरना

सूर्य  जैसी शोभती है
भाल पर बिंदी सुहागिन।
और कज्जल शर्वरी में
ऊँघती सी एक धामिन।
शुभ्र मुक्ता हार से तुम
वेदना सम्पूर्ण हरना।।

नथ चमकती चंद्रिका सम
कर्ण फूलों में महक है।
अध बुझे अंगार की ज्यों
दग्ध अधरों पर दहक है।
चूड़ियों की है खनक या
खिलखिलाता एक झरना।।

है महावर शुभ्र त्रिपटी
पर सुशोभित रक्त चंदन।
मुद्रिका ज्यों तर्जनी का
लाजवर्दी प्रात वंदन।
कृष्ण मेघों सी लटों में
दामिनी सम पुष्प धरना।।

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